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बौद्ध धर्म और, ईसाई धर्म के बीच अंतर, 15 का भाग 3

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इस एपिसोड में, सुप्रीम मास्टर चिंग हाई समझाती हैं कि प्रभु यीशु मसीह (शाकाहारी) और प्रभु बुद्ध (वीगन) दोनों ही प्रबुद्ध मास्टर थे जिन्होंने प्रबोधन की शिक्षा दी, और इसका सार एक ही है। हालाँकि, अलग-अलग परिस्थितियों के कारण, जिसमें भगवान बुद्ध की लंबी शिक्षण अवधि और उनके शिष्यों के अनुभवों के रिकॉर्ड शामिल हैं, बौद्ध धर्म में ईसाई धर्म की तुलना में शिक्षाओं का एक समृद्ध खजाना बचा हुआ है।

(क्या मुझे अब सुप्रीम मास्टर चिंग हाई को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का सम्मान मिल सकता है। मास्टर चिंग हाई, धन्यवाद।

हमारे यहां कभी भी अमेरिका की तरह इतने “ज्यादा” लोग दर्शकगण में नहीं होते। दरअसल, लोग बहुत ही कम हैं। हमें इससे पहले कभी इतने कम दर्शकगण के सामने प्रस्तुति देने की आदत नहीं रही है। जैसे भी। तो, फिर भी आपका स्वागत है, और हम मिलकर इसे पूरा करेंगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आये हुए लोगों की संख्या कितनी कम है। व्याख्यान जारी रहेगा और इससे आज के बाद भी लोगों को लाभ मिलेगा। मेरी पुस्तकों में छपे कुछ व्याख्यानों तो कभी-कभी केवल पांच या छह करीबी शिष्यों के सामने ही दिए गये हैं, न कि किसी बड़े श्रोतागण के सामने, और फिर उनसे कई लोगों को लाभ होता है। तो आप मेरे लिए कुछ बोलने का सिर्फ एक बहाना हो।

देखिए, मेरी कुछ व्याख्यानों जो पुस्तकों में छपे हैं, वास्तव में बड़े श्रोतागणों के लिए नहीं बल्कि मेरे कुछ तथाकथित शिष्यों के लिए हैं, यदि मैं उन्हें शिष्य कह सकती हूँ। मुझे नहीं पता कि इन लोगों को और क्या कहा जाता है। मेरे मित्रों या मेरे सहयोगीयों। मानव भाषा में, कई चीजों के लिए कई शब्दों होते हैं। मुझे उन्हें शिष्यों कहने में शर्म आती है, लेकिन मुझे नहीं पता कि यदि कोई और नाम भी है। तो ये तथाकथित शिष्यों मेरे उन सभी व्याख्यानों को लिख लेते हैं जो केवल उन्हीं के लिए हैं - यानी लोगों के उन्नत दिमागों के लिए - और वे उन्हें लिख लेते हैं ओर सार्वजनिक रूप से प्रकाशित भी कर देते हैं। और कभी-कभी इससे मुझे काफी परेशानी होती हैं, दिक्कतें। क्योंकि कभी-कभी जो बात आप एक व्यक्ति से कह सकते हैं, वह दूसरे व्यक्ति से नहीं कह सकते। उदाहरण के लिए, डॉक्टर माई ने अभी जिन चीजों की ओर आपका ध्यान दिलाया, वे केवल उन्हीं के लिए थीं, क्योंकि ये सारे सवालों उसी ने पूछे थे। लेकिन कोई बात नहीं, क्योंकि उन्होंने पहले ही इस बात को आपके ध्यान में ला दिया है, मैं भी इसका पालन करूंगी। मैं भी इसका श्रेष्ठ इस्तेमाल करुंगी।

देखिए, ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो व्यक्तियों के मन में उठते हैं, जैसे कि धर्मों के बीच क्या अंतर्संबंध हैं? और अतीत के इन सभी मास्टरों के ये सभी कथनों क्या हैं? इनके वास्तविक अर्थ क्या होते है? लेकिन साथ ही, इन सवालों पर सभी को विचार करना चाहिए, न कि केवल डॉक्टर गुयेन या मुझे, या केवल व्यक्तिओं के छोटे समुह को। लेकिन चूंकि ये विषयों या प्रश्नों बहुत विवादास्पद होते हैं, इसलिए कभी-कभी मैं सार्वजनिक रूप से [उनपर] चर्चा करने में संकोच होता है और केवल उन्हीं लोगों को बताती हूं जो वास्तव में इन चीजों में रुचि रखते हैं। इसलिए, जब मैं ज्यादातर ईसाई श्रोताओं के सामने जाती हूं, तो मैं केवल ईसाई धर्म के बारे में ही बात करती हूं, ईसाई शब्दावली का इस्तमाल करती हूं। और जब मैं बोल रहा होता हूँ, चाहे औलासेस (वियतनामी) समूह को संबोधित कर रही हूँ या चीनी लोगों को या किसी और को, तो मैं केवल बौद्ध धर्म को ही संबोधित करना पसंद करूँगी। इसलिए, अगर मैं किसी हिंदू समूह से मिलती, तो मैं निश्चित रूप से हिंदू धर्म के बारे में बात करूँगी।

तो शायद मैं आपसे पूछूं, आज आप क्या सुनना चाहेंगे? क्या कुछ खास है? (प्रबोधन।) ज्ञानोदय? ज्ञानोदय, वास्तव में आप इसे "सुन" नहीं सकते; आपको [इसका] अनुभव अवश्य करना चाहिए। खैर, माहौल को सहज बनाने में हमें थोड़ा समय लगाते है। इसलिए, कृपया धैर्य रखें। साथ ही, व्याख्यान के बीच में उठकर न जाएं ताकि आपको उसकी केवल अधूरी धारणा न हो। और फिर आप आखिरी वाक्यों पर ही अटके रह सकते हैं, और फिर वक्ता के बारे में गलत धारणा बना सकते हैं। हमें जो कुछ भी सुनना है, उन्हें पूरी तरह से सुनना चाहिए, तभी हम उस व्याख्यान के प्रभाव को समझ पाएंगे। मैंने देखा है कि कुछ लोग, कभी-कभी, केवल एक या दो वाक्य सुनते हैं, जो बहुत उत्तेजक हो ऐसे लगते हैं, और वे कहते हैं, "बस इतना ही। मुझे यह पसंद नहीं है।" और फिर वे यह समझे बिना बाहर चले जाते हैं कि इसके बाद क्या आने वाला है।

अब, हाँ, कृपया। (द रेज़र्स एज के कुछ विचारों में कहा गया है कि पहाड़ों में एक पवित्र व्यक्ति होना आसान था, लेकिन उपन्यास में वास्तव में इसका कोई जवाब नहीं दिया गया है।) आपको क्या लगता है... पर्यावरण कितना महत्वपूर्ण है? जी हाँ। (आध्यात्मिकता में।)

मैं समझती हूँ। आपने मेरे छात्रों को ही सुना है। वे इंजीनियरो हैं, या उनमें से कुछ डॉक्टरों, चिकित्सकों, मजदूरो, या टैक्सी चालको, या कई तरह के सामाजिक पदों पर कार्यरत हैं। और वे दैनिक जीवन में काम कर रहे हैं और अभ्यास भी कर रहे हैं। और मेरे बारे में, मैं एक मठवासिनी थी और मैंने बहुत अल्प समय के लिए घुमंतु जीवन का आनंद लिया। मेरी नियति यह नहीं है कि मैं लंबे समय तक पहाड़ों में या मठ में आराम से मठवासिनी का जीवन व्यतीत कर सकूं। तो, अब जैसी हूँ आप देखते हैं, मैं अब हर तरह के लोगों के साथ घुलमिल रही हूं और एक बहुत ही सक्रिय जीवन जी रही हूं। मैं कई देशों में जा चुकी हूं, कई लोगों से बात कर चुकी हूं, और रोजाना अलग-अलग लोगों के संपर्क में रहती हूं।

कभी-कभी आपको पहाड़ों की ज़रूरत होती है, कभी-कभी सिर्फ़ अपनी आत्मा को तरोताज़ा करने के लिए, अपने शरीर को तरोताज़ा करने के लिए, और फिर कुछ ऊर्जा इकट्ठा करने के लिए, और फिर आपको बाहर जाकर दोबारा देना होता है। इसलिए, भिक्षु बनना या न बनना एक ही बात है। यदि आप गृहस्थो हैं, तो हमें कभी-कभी पहाड़ों पर, या मठ में, या अपने मास्टर के निवास पर जाकर कुछ शांति, कुछ शांत आत्मा का अनुभव प्राप्त करना चाहिए स्वयं को तरोताजा करने के लिए, लेकिन बाद में हमें हमेशा वहीं नहीं रहना चाहिए। तो, कोई अंतर नहीं है।

तो अब चलिए उस बात पर आते हैं जो मैं आपको बताना चाहती हूं। तो, आज मैं आपको यह बताना चाहूंगी: "बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म में क्या अंतर है?"

अब मैं जहां भी जाती हूं, मैं लोगों से कहती हूं: "वैसे बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म में कोई अंतर नहीं है।" असल में, कोई नहीं है, लेकिन कुछ फर्क जरूर है। अच्छा, दरअसल, जब (भगवान) यीशु और बुद्ध ने ज्ञानोदय के बारे में बात की, तो उसमें कोई अंतर नहीं है। लेकिन अगर आप बौद्ध सूत्रों को पढ़ेंगे, तो कई अलग-अलग बातें हैं। बौद्ध धर्म एक अधिक समृद्ध खजाना प्रस्तुत करता है। बस इतना ही।

यदि (प्रभु) यीशु मसीह को केवल साढ़े तीन वर्ष के बजाय अधिक समय तक जीवित रहने की अनुमति दी गई होती, तो वे हमें अस्तित्व के कई तथाकथित स्तरों - बुद्ध की तरह उपलब्धि के कई स्तरों के बारे में बता सकते थे। तो यही ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म के बीच का अंतर है। ईसाई धर्म में केवल एक ही बाइबिल है, लेकिन मैंने यह नहीं कहा कि उसमें ईसाई धर्म में सार नहीं है। इसका सार उत्कृष्ट है और सब कुछ उसमें है। यही कारण है कि कुछ लोग बौद्ध धर्म का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं, क्योंकि बौद्ध धर्मग्रंथों बहुत विशाल हैं - अनुभवों और आंतरिक ज्ञानोदय की इतनी व्यापक श्रेणियां हैं जिनका उल्लेख करने के लिए यीशु के पास समय नहीं था।

इसलिए, बहुत से लोगों को गलतफहमी हुई और सोचते हैं कि (भगवान) यीशु ने बुद्ध की तरह उच्च कोटि की उपलब्धि प्राप्त नहीं की थी। क्योंकि बुद्ध चेतना के अनेक विभिन्न स्तरों से गुजरे हैं, और इसलिए उन्होंने अस्तित्व के कई तथाकथित आंतरिक स्तरों का सामना किया है। और उन्होंने अपने शिष्यों से कहा। और साथ ही, बुद्ध के कुछ शिष्यों अस्तित्व के इस तरह के स्तरों में गये थें और उन्हें लिख लिया था। इसलिए, हमारे पास बौद्ध सूत्रों का एक बहुत समृद्ध भंडार है, जबकि ईसाई धर्म में, उस समय के प्रचलित उत्पीड़न और साथ ही (भगवान) यीशु के अल्प जीवनकाल के कारण, हमें उनके शिष्यों की उपलब्धियों के साथ-साथ मास्टर की उपलब्धियों के भी बहुत कम हवाले मिलते हैं।

तो अब मैं बौद्ध सूत्रों में से एक के बारे बताउंगी, जो बुद्ध के शिष्यों के आंतरिक अनुभवों में से एक का वर्णन करता है। इस सूत्र को "अमिताभ बुद्ध सूत्र" कहा जाता है।

अमिताभ बुद्ध का सूत्र। सूत्र का अर्थ है "शास्त्र।" उस बौद्ध साहित्य में, बुद्ध के एक शिष्य के अनुभव का वर्णन किया गया है। वह शिष्या भारत की रानी थी, लेकिन उन्हें जेल में डाल दिया गया। अब, जब वह जेल में थी, तो उन्हें अपने मास्टर, यानी बुद्ध - भारत के शाक्यमुनि बुद्ध को देखने की बहुत तीव्र इच्छा थी। अब, जब वह इतनी तीव्र लालसा में थी, तभी मास्टर उनके सामने प्रकट हुए। मास्टर भौतिक शरीर में नहीं, बल्कि प्रकाशमय शरीर में प्रकट हुए, जिसे हम प्रकाश शरीर या प्रकट शरीर कहते हैं।

अभिव्यक्ति। अभिव्यक्त शरीर। किसी भी प्रकार के मास्टर जिसने उच्च स्तर की उपलब्धि प्राप्त कर चुकी हो, वे अपने शिष्यों के लिए अलग-अलग स्थानों पर प्रकट होने के लिए वह एक साथ अनेक शरीरों अभिव्यक्त कर सकते है।

Photo Caption: "सच्चा प्यार रोजमर्रा की रुकावटों से ऊपर उठ सकता है"

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